पोटली
चंद यादें एक पोटली में बाँध कर रखी थी
गुम सी गई है… ज़रा ढूँढ दे कोई
सफेद सी थी…मेहबूब के उजले चेहरे की तरह
उसके इत्र की बूँदों से महकती थी पोटली मेरी
एक गुलाब था उसमें,
निशानी सा पहली मुलाक़ात की
एक काजल की डिबिया
उसे सुंदर बनाती, नज़र से बचाती थी
चंद kissme भी रखी थी उसमें, कुछ मिठास के लिए
एक रुमाल,जो रह गया था पास
मगर जो लौटाया नही हमने कभी
उसमें आज भी क़ैद है नज़दीकियों के एहसास..
बहुत कीमती हैं वो यादें..
इस बार जो आएगी ज़ेहन में..
दिल के लॉकर में बंद कर दूंगा
आजकल भीड़ बहुत है ख्यालों की
यादों के खो जाने का डर बढ़ गया है…..


पेड़
कहाँ चले गए तुम
अपनी हरियाली साथ लेकर
छीन आशियानें हज़ारों पंछियों के
जो कभी शान से रहा करते थे तुम्हारे दरख्तों पर
वो नदी जो बहती थी इठला के तेरे आँचल में
अब बेनूर बेजान सी हो चुकी है ….
वो नन्हे पौधे जो यूँ ही उग आया करते थे तेरी छांव तले
के अब उन्हें ज़मीं पर आने का मन नही करता…
वो झरने जो बहते थे बेपरवाह सावन में
वो मेहमां कहीं रुठ कर चले गए हैं
ओस की बूंदे जो जन्नत बनाती थी सुबह को
पत्तियों से बिछड़, धुएं में मिलने लगी है
जानवर जो कभी करते थे किलकारियां
चिड़ियाघरों में कैद ख़ामोश हो चले हैं
रातों को रोशन करते, चमकते वो जुगनु
वो ज़मीन के तारे, अब नज़र से ओझल हो चले हैं
वो पेड़ जो आसरा देते थे हम इंसानो को
आज बेनूर बेज़ार नज़र आते हैं
कटी शाखें,सूखे पत्ते लिए लाचार नज़र आते हैं
देर नहीं हुई अब भी ,चलो बचाएं इन हरे फरिश्तों को
के जब ये दुआ देते हैं रहमतों की बारिश होती है……

